अर्थव्यवस्था में दबावग्रस्त आस्तियों को सशक्त करने के लिए ढांचा – संयुक्त ऋणदाता फोरम (जेएलएफ) तथा सुधारात्मक कार्रवाई योजना (सीएपी)के संबंध में दिशानिर्देश
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आरबीआई/2013-14/503 26 फरवरी 2014 सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर) महोदय अर्थव्यवस्था में दबावग्रस्त आस्तियों को सशक्त करने के लिए ढांचा – संयुक्त ऋणदाता कृपया 30 जनवरी 2014 को हमारी वेबसाइट में डाले गए अनुदेशों को देखें जो अर्थव्यवस्था में दबावग्रस्त आस्तियों को सशक्त करने के संबंध में है। तदनुसार, उक्त ढांचे को परिचालन में लाने हेतु संयुक्त ऋणदाता फोरम (जेएलएफ) के गठन और सुधारात्मक कार्रवाई योजना (सीएपी) को अंगीकृत करने से संबंधित विस्तृत दिशानिर्देश नीचे दिए गए हैं। ये दिशानिर्देश संघीय ऋण तथा बहुविध बैंकिंग व्यवस्थाओं (एमबीए) के अंतर्गत ऋण प्रदान करने के लिए लागू होंगे। [केवल पैराग्राफ 2.1, 7.1, 8 तथा 9 के अनुदेशों को छोड़कर जो ऋण प्रदान करने के सभी मामलों में लागू होंगे] और इन्हें 'आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण और अग्रिमों से संबंधित प्रावधानीकरण' पर हमारे नवीनतम मास्टर परिपत्र और इस संबंध में समय समय पर जारी होने वाले किसी अन्य अनुदेश के साथ पढ़ा जाना चाहिए। 2. संयुक्त ऋणदाता फोरम का गठन 2.1 जैसा कि ढांचे के पैरा 2.1.1 में प्रस्तावित है; इससे पूर्व कि कोई ऋण खाता एनपीए हो जाए, बैंकों से अपेक्षित है कि वे नीचे दी गई तालिका के अनुसार स्पेशल मेंशन एकाउंट (एसएमए1) श्रेणी के अंतर्गत तीन उप-श्रेणियां उत्पन्न करके खाते में प्रारंभिक दबाव की पहचान करें:
2.2 ढांचे में यह भी प्रस्तावित किया गया था कि भारतीय रिज़र्व बैंक ऋणदाताओं के लिए ऋण से संबंधित सूचना का संग्रह, संचय एवं वितरण करने के लिए बड़े ऋणों से संबन्धित सूचना का केंद्रीय निधान {सेंट्रल रिपोजिटरी ऑफ इंफार्मेशन ऑन लार्ज क्रेडिट्स (सीआरआईएलसी)} की स्थापना करेगा। तदनुसार 'बड़े ऋणों से संबंधित सूचना का केंद्रीय निधान – रिपोर्टिंग में संशोधन' पर 13 फरवरी 2014 के परिपत्र डीबीए.सं.ओएसएमओएस.9862/33.01.018/2013-14 के माध्यम से हमारे बैंकिंग पर्यवेक्षण विभाग (डीबीएस) ने सूचित किया है कि बैंकों से यह अपेक्षित है कि वे 50 मिलियन रुपए या उससे अधिक के सकल निधि आधारित तथा गैर-निधि आधारित एक्सपोजर वाले अपने सभी उधारकर्ताओं के संबंध में एसएमए के रूप में खाते के वर्गीकरण सहित साख सूचना सीआरआईएलसी को प्रस्तुत करें। 2.3 बैंकों को सूचित किया जाता है कि किसी ऋणदाता द्वारा किसी खाते को सीआरआईएलसी से एसएमए-2 के रूप में रिपोर्ट किया जाता है उन्हें अनिवार्य रूप से एक समिति बनानी चाहिए जिसे संयुक्त ऋणदाता फोरम (जेएलएफ) कहा जाएगा यदि उस खाते में ऋणदाताओं का संपूर्ण एक्सपोजर (एई) [निधिआधारित तथा गैर-निधि आधारित को जोड़कर] 1000 मिलियन रुपए या उससे अधिक है। ऋणदाताओं को एक संयुक्त ऋणदाता गठित करने का विकल्प तब भी है जब खाते में कुल एक्सपोजर (एई) 1000 मिलियन रुपए से कम है और/अथवा जब खाते को एसएमए-0 अथवा एसएमए-1 के रूप में रिपोर्ट किया जाता है। 2.4 संघीय खातों के लिए मौजूदा संघीय व्यवस्था संयोजक के रूप में जहां संघ के अगुआ के साथ जेएलएफ का कार्य करेगी, वहीं बहुविध बैंकिंग व्यवस्थाओं (एमबीए) के अंतर्गत खातों के लिए, अधिकतम एई वाला ऋणदाता यथाशीघ्र जेएलएफ का संयोजन करेगा तथा खाते से संबंधित साख सूचना का आदान-प्रदान सुनिश्चित करेगा। यदि किसी उधारकर्ता के लिए ऋणदाताओं के कई संघ हैं (उदाहरण के लिए कार्यशील पूंजी तथा मीयादी ऋण के लिए पृथक संघ), तो सर्वाधिक एई वाला ऋणदाता जेएलएफ का संयोजन करेगा। 2.5 यह संभव है कि कोई उधारकर्ता किसी आसन्न दबाव के कारण ऋणदाता/ओं से ठोस आधार पर जेएलएफ के गठन का अनुरोध करे। जब किसी ऋणदाता को इस प्रकार का अनुरोध प्राप्त हो तो खाते को सीआरआईएलसी में एसएमए-0 के रूप में रिपोर्ट किया जाना चाहिए तथा यदि एई 1000 मिलियन रुपए या उससे अधिक है तो ऋणदाताओं को तुरंत जेएलएफ का गठन भी कर लेना चाहिए। तथापि वर्तमान के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि एसएमए-0 रिपोर्टिंग के अन्य मामलों में जेएलएफ का गठन वैकल्पिक है। 2.6 सभी ऋणदाताओं द्वारा जेएलएफ का कार्य करने के लिए व्यापक नियमों को समाविष्ट करते हुए एक करार (जिसे जेएलएफ करार कहा जा सकता है) बनाया जाना चाहिए तथा उस पर सभी को हस्ताक्षर करना चाहिए। इंडियन बैंक एसोसिएशन (आईबीए) एक मास्टर जेएलएफ करार तथा जेएलएफ के लिए परिचालन दिशानिर्देश तैयार करेगा जिसे सभी ऋणदाताओं द्वारा अंगीकृत किया जा सकेगा। जेएलएफ में उधारकर्ता द्वारा खाते की अनियमितताओं/कमजोरियों को दूर करने की संभावना की तलाश की जानी चाहिए। यदि वित्तपोषण प्राप्त करने वाली परियोजना के कार्यान्वयन में केंद्रीय/राज्य सरकार/परियोजना प्राधिकारियों/ स्थानीय प्राधिकारियों की कोई भूमिका हो तो जेएलएफ उनके प्रतिनिधियों को आमंत्रित कर सकता है। 2.7 जिन खातों का एई 1000 मिलियन रुपया या उससे अधिक होगा उनके लिए जेएलएफ का गठन तथा अनुवर्ती सुधारात्मक कार्रवाई अनिवार्य होगी ही, अन्य मामलों में भी ऋणदाताओं को आस्ति गुणवत्ता की सूक्ष्मता से निगरानी करनी होगी तथा प्रभावी समाधान के लिए यथोचित सुधारात्मक कार्रवाई करनी होगी। 3. जेएलएफ द्वारा सुधारात्मक कार्रवाई योजना (सीएपी) 3.1 खाते में विभिन्न दबावों का समाधान करने के लिए जेएलएफ विभिन्न विकल्पों पर विचार कर सकता है। यहां उद्देश्य पुनर्रचना या वसूली जैसे किसी विशिष्ट समाधान विकल्प को प्रोत्साहित करना, कि, नहीं है बल्कि एक त्वरित और व्यवहार्य समाधान पर पहुंचना है जिससे ऋणदाता के ऋणों के साथ-साथ अंतर्निहित आस्तियों के आर्थिक मूल्य की संरक्षा की जा सके। जेएलएफ द्वारा सुधारात्म्क कार्रवाई योजना (सीएपी) में सामान्य तौर पर निम्नलिखित विकल्प शामिल होंगे: (क) परिशोधन - खाते को विनियमित करने के लिए उधारकर्ता से विनिर्दिष्ट प्रतिबद्धता प्राप्त करना ताकि खाता एसएमए स्थिति से बाहर निकल आए या वह एनपीए श्रेणी में न चला जाए। यह प्रतिबद्धता अपेक्षित समयावधि के भीतर स्पष्ट नकदी प्रवाहों द्वारा समर्थित होनी चाहिए और इसमें मौजूदा ऋणदाताओं की ओर से किसी प्रकार की हानि या त्याग शामिल नहीं होना चाहिए। यदि मौजूदा प्रवर्तक अतिरिक्त धन जुटा पाने या खाते को विनियमित करने की स्थिति में नहीं हैं तो जेएलएफ द्वारा उधारकर्ता से परामर्श करके किसी अन्य इक्विटी/रणनीतिक निवेशकों को ढूंढने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है। इन उपायों का उद्देश्य ऋण की शर्तों में किसी प्रकार के परिवर्तन के बिना संस्था/कंपनी का कायापलट करना है। यदि आवश्यक समझा जाए तो संशोधन प्रक्रिया के भाग के रूप में उधारकर्ता को उसकी आवश्यकतानुसार अतिरिक्त वित्त प्रदान कराने पर भी जेएलएफ विचार कर सकता है। तथापि यह कड़ाई से सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अतिरिक्त वित्तपोषण खाते के सदाबहारीकरण के लिए उपलब्ध नहीं कराया गया है। (ख) पुनर्रचना - खाते की पुनर्रचना की संभावना पर तभी विचार करें जब यह प्रथम दृष्टया अर्थक्षम हो तथा उधारकर्ता इरादतन चूककर्ता न हो अर्थात् निधियों का किसी प्रकार का दुरुपयोग, धोखाधड़ी या कुकृत्य आदि न किया गया हो। इस स्तर पर प्रवर्तकों से वचनबद्धता उनके व्यक्तिगत गारंटी प्रदान करने तथा उनकी निवल मालियत विवरणी, जो आस्तियों के विधिक स्वत्व लेखों की प्रतियों द्वारा समर्थित हों, प्राप्त की जा सकती हैं तथा एक घोषणा भी प्राप्त की जा सकती है कि वे जेएलएफ की अनुमति के बिना ऐसा कोई लेनदेन नहीं करेंगे जो आस्तियों को अलग कर दें। यदि उधारकर्ताओं वचनबद्धता से विमुख होते हैं जिससे ऋणों की सुरक्षा/वसूली योग्यता प्रभावित होती है तो इसे वसूली प्रक्रिया शुरू करने का वैध कारण माना जाए। इस कार्रवाई को टिकाऊ बनाने के लिए जेएलएफ के ऋणदाता एक आंतरिक क्रेडिटर समझौते (आईसीए) पर हस्ताक्षर कर सकते हैं तथा उधारकर्ता से डेटर-क्रेडिटर समझौते (डीसीए) पर हस्ताक्षर करने की अपेक्षा कर सकते हैं जो किसी पुनर्रचना प्रक्रिया के लिए विधिक आधार प्रदान करेगा। यदि आवश्यक हो आईसीए तथा डीसीए के लिए कारपोरेट ऋण पुनर्रचना (सीडीआर) प्रणाली द्वारा प्रयुक्त फार्मेट पर यथोचित परिवर्तन के साथ विचार किया जा सकता है। साथ ही, पुनर्रचना की प्रक्रिया को सुगम बनाने हेतु डीसीए में एक 'स्टैंड-स्टिल'2 की शर्त निर्धारित की जाएगी। 'स्टैंड-स्टिल' शर्त का तात्पर्य यह नहीं है कि उधारकर्ता इसके बाद ऋणदाता को भुगतान नहीं कर सकेगा। आईसीए यह शर्त भी निर्धारित कर सकता है कि जमानती तथा गैर-जमानती दोनों प्रकार के ऋणदाताओं को अंतिम समाधान के लिए सहमत होना आवश्यक है। (ग) वसूली - जब यह पाया जाता है कि उक्त दो विकल्प (क) और (ख) व्यवहार्य नहीं हैं, उचित वसूली प्रक्रिया अपनायी जा सकती है। जेएलएफ प्रयासों और परिणामों को सुफलित करने की दृष्टि से उपलब्ध विभिन्न विधिक तथा अन्य वसूली विकल्पों में से सर्वोत्तम वसूली पद्धति को अपना सकता है। 3.2 जेएलएफ में मूल्य के हिसाब से न्यूनतम 75% ऋणदाताओं तथा संख्या के हिसाब से 60% ऋणदाताओं द्वारा सहमतिपूर्वक लिए गए निर्णय को खाते की पुनर्रचना की कार्रवाई शुरू करने का आधार माना जाएगा तथा आईसीए की शर्तों के अंतर्गत सभी ऋणदाताओं के लिए बाध्यकारी होगा। तथापि, यदि जेएलएफ वसूली प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लेता है तो किसी संबंधित नियमों/अधिनियमों के अंतर्गत बाध्यकारी निर्णय के लिए न्यूनतम मानदंड, यदि कोई हों, लागू होंगे। 3.3 जेएलएफ से यह अपेक्षित है कि वह (i) एक या एक से अधिक ऋणदाताओं द्वारा किसी खाते के एसएमए-2 रिपोर्ट होने की तिथि, अथवा (ii) यदि उधारकर्ता आसन्न दबाव का पूर्वानुमान ठोस आधार पर करता है तो जेएलएफ गठित करने हेतु उससे अनुरोध मिलने की तिथि से 30 दिन के भीतर सीएपी के लिए अपनाए जाने वाले विकल्प पर समझौता करे। जेएलएफ को इस प्रकार का समझौता तैयार होने की तिथि से अगले 30 दिनों के भीतर विस्तृत अंतिम सीएपी (कैप) पर हस्ताक्षर करना चाहिए। 3.4 यदि जेएलएफ विकल्प 3.1(क) और (ख) के संबंध में निर्णय करता है किंतु खाता विकल्प (क) और (ख) के अंतर्गत सहमत शर्तों के अनुसार कार्य-निष्पादन में असफल रहता है तो जेएलएफ को विकल्प 3.1 (ग) के अंतर्गत वसूली की कार्रवाई आरंभ करनी चाहिए। 4. पुनर्रचना प्रक्रिया 4.1 अग्रिमों की पुनर्रचना के संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक के मौजूदा विवेकपूर्ण दिशानिर्देश एकल बैंकिंग तथा बहुविध/संघीय व्यवस्थाओं के अंतर्गत अग्रिमों की पुनर्रचना के लिए विस्तृत कार्य पद्धति और मानदंड निर्धारित करते हैं। कारर्पोरेट ऋण पुनर्रचना (सीडीआर) प्रणाली बैंकों के बहुविध/संघीय अग्रिमों की पुनर्रचना के लिए संस्थात्मक ढांचा है जिसमें प्रत्येक लेनदेन आधारित व्यवस्थाओं में हस्ताक्षर कर वे उधारदाता भी शामिल हो सकते हैं जो सीडीआर प्रणाली में शामिल नहीं हैं। 4.2 यदि जेएलएफ खाते की पुनर्रचना सीएपी के रूप में करने का निर्णय लेता है तो उसके पास यह विकल्प होगा कि वह या तो उक्त पैरा 3.1 के अंतर्गत पुनर्रचना का निर्णय लिए जाने के बाद सीडीआर प्रकोष्ठ को खाते का संदर्भ दे या उसकी सीडीआर प्रणाली से स्वतंत्र रूप से पुनर्रचना करे। 4.3 जेएलएफ द्वारा पुनर्रचना 4.3.1 यदि जेएलएफ सीडीआर प्रणाली से मुक्त किसी खाते की पुनर्रचना का निर्णय लेता है तो जेएलएफ को विस्तृत तकनीकी आर्थिक व्यवहार्यता (टीईवी) अध्ययन करवाना चाहिए तथा अर्थक्षम पाने पर उक्त पैरा 3.3 में बताए गए अनुसार अंतिम सीएपी को साइन ऑफ करने की तिथि से 30 दिनों के भीतर पुनर्रचना पैकेज को अंतिम रूप देना चाहिए। 4.3.2 5000 मिलियन रुपए से कम एई वाले खातों के लिए, उक्त पुनर्रचना पैकेज को जेएलएफ द्वारा अनुमोदित होना चाहिए और कार्यान्वयन के लिए अगले 15 दिनों के भीतर ऋणदाताओं द्वारा उधारकर्ताओं को इसकी सूचना दे दी जानी चाहिए। 4.3.3 5000 मिलियन रुपए से अधिक एई वाले खातों के लिए उल्लिखित टीईवी अध्ययन तथा पुनर्रचना पैकेज का विशेषज्ञों की एक ऐसी स्वतंत्र मूल्यांकन समिति (आईईसी)3 से मूल्यांकन करवाना पड़ेगा जो कतिपय पात्रता शर्तों को पूरा करती हो। यह आईईसी, यह सुनिश्चित करने के बाद कि पुनर्रचना की शर्तें ऋणदाताओं के प्रति ईमानदार हैं, अर्थक्षमता से संबंधित पहलुओं पर ध्यान देगी। आईईसी से इन मामलों से संबंधित अपनी संस्तुतियां जेएलएफ को 30 दिन की अवधि के भीतर देना अपेक्षित होगा। उसके बाद यदि आईईसी के विचारों को ध्यान में रखकर जेएलएफ पुनर्रचना के कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहता है तो पुनर्रचना पैकेज की संस्तुति, ऋणदाताओं और उधारकर्ताओं द्वारा परस्पर सहमत शर्तों समेत, समस्त ऋणदाताओं द्वारा किया जाना अपेक्षित होगा और कार्यान्वयन के लिए अगले 15 दिनों के भीतर उधारकर्ता को उसकी सूचना दे दी जाएगी। 4.3.4 मौजूदा दिशानिर्देशों के अंतर्गत यथालागू आस्ति वर्गीकरण लाभ ऐसे पुनर्रचित खातों को इस प्रकार प्राप्त हो जाएंगे मानो उनकी पुनर्रचना सीडीआर प्रणाली के अंतर्गत की गई है। इस प्रयोजन से खाते का आस्ति वर्गीकरण जेएलएफ के गठन की तिथि के अनुसार माना जाएगा। 4.3.5 ऊपर उल्लिखित समय सीमाएं अधिकतम अनुमत समयावधि है तथा जेएलएफ को चाहिए कि वह साधारण पुनर्रचना के मामलों में यथाशीघ्र एक पुनर्रचना पैकेज निर्धारित करने का प्रयास करें। 4.3.6 जेएलएफ द्वारा जेएलएफ के एक या एक से अधिक ऋणदाताओं द्वारा केवल मानक, एसएमए और अवमानक आस्तियों के रूप में रिपोर्ट की जाने वाली आस्तियों के संबंध में पुनर्रचना के मामले लिए जाएंगे। सामान्य तौर पर संदिग्ध के रूप में वर्गीकृत किसी भी खाता की पुनर्रचना के लिए जेएलएफ द्वारा विचार नहीं किया जाना चाहिए, किंतु जिन मामलों में कर्ज का छोटा हिस्सा संदिग्ध है अर्थात् खाता कम से कम 90% ऋणदाताओं की बहियों में (मूल्य के आधार पर) मानक/अवमानक है, जेएलएफ द्वारा पुनर्रचना के लिए खाते पर विचार किया जा सकता है। 4.3.7 इरादतन चूककर्ता सामान्यतः पुनर्रचना के लिए पात्र नहीं रहेंगे। तथापि जेएलएफ उधारकर्ता के इरादतन चूककर्ता के रूप में वर्गीकरण के कारणों की समीक्षा करे तथा स्वयं को संतुष्ट कर ले कि उधारकर्ता इरादतन चूक को सुधारने की स्थिति में है। ऐसे मामलों को पुनर्रचित करने के निर्णय को, उस जेएलएफ के भीतर जिसने उधारकर्ता को इरादतन चूककर्ता के रूप में वर्गीकृत किया है, उस बोर्ड या बैंक विशेष का अनुमोदन भी प्राप्त होना चाहिए। 4.3.8 जेएलएफ द्वारा खाते की अर्थक्षमता का निर्धारण उनके द्वारा निर्धारित स्वीकार्य अर्थक्षमता पैमानों पर आधारित होना चाहिए। उदाहरण के लिए इन पैमानों में कर्ज़-इक्विटी अनुपात, डेट-सर्विस कवरेज अनुपात, चलनिधि/चालू अनुपात और पुनर्रचित अग्रिम इत्यादि के उचित मूल्य में गिरावट के बदले में अपेक्षित प्रावधान की रकम आदि सम्मिलित हो सकते हैं। इसके अलावा जेएलएफ सीडीआर प्रणाली द्वारा अपनाए जाने वाले अर्थक्षमता पैमानों के लिए बेंचमार्क पर विचार कर सकते हैं (जैसा कि बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा अग्रिमों की पुनर्रचना पर विवेकपूर्ण दिशानिर्देशों की समीक्षा पर 30 मई 2013 के परिपत्र सं.बैंपविवि.बीपी.बीसी.सं.99/21.04.132/2012-13 के परिशिष्ट में उल्लिखित है) और, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अर्थव्यवस्था के विविध सेक्टर कार्यनिष्पादन के विविध सूचक दर्शाते हैं, उन्हें उचित समायोजनों के साथ अपना सकते हैं। 4.4 जेएलएफ द्वारा सीडीआर सेल को हस्तांतरित पुनर्रचना 4.4.1 पैरा 3.1 के अंतर्गत पुनर्रचना का निर्णय लिए जाने के बाद यदि जेएलएफ पुनर्रचना को सीडीआर प्रकोष्ठ को हस्तांतरित करने का निर्णय लेता है तो निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाए। 4.4.2 चूंकि खाते की प्राथमिक अर्थक्षमता जेएलएफ द्वारा पहले ही तय की जा चुकी है, सीडीआर प्रकोष्ठ को जेएलएफ से परामर्श करके जेएलएफ द्वारा उसे सौंपे जाने की तिथि से 30 दिनों के भीतर सीधे तकनीकी-आर्थिक अर्थक्षमता (टीईवी) अध्ययन और पुनर्रचना योजना तैयार करना चाहिए। 4.4.3 5000 मिलियन रुपए से कम एई वाले खातों के लिए उक्त पुनर्रचना पैकेज अनुमोदन के लिए सीडीआर इम्पावर्ड ग्रुप (ईजी) को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। मौजूदा अनुदेशों के अंतर्गत सीडीआर ईजी संशोधन का सुझाव दे सकता है या उसकी संस्तुति कर सकता है किंतु वह ये सुनिश्चित करेगा कि अंतिम निर्णय कुल 90 दिनों की अवधि के भीतर लिया जाता है, जिसे सीडीआर प्रकोष्ठ को प्रेषित किए जाने की तिथि से अधिकतम 180 दिनों तक विस्तारित किया जा सकता है। तथापि जेएलएफ द्वारा सीडीआर प्रकोष्ठ को प्रेषित मामलों पर अंतिम निर्णय सीडीआर ईजी द्वारा अगले 30 दिनों के भीतर लिया जाएगा। यदि सीडीआर ईजी द्वारा अनुमोदित हो जाता है तो पुनर्रचना पैकेज का अनुमोदन सभी ऋणदाताओं द्वारा किया जाना चाहिए और उधारकर्ता को कार्यान्वयन हेतु उसकी सूचना अगले 30 दिनों के भीतर दी जानी चाहिए। 4.4.4 5000 मिलियन रुपए या अधिक के एई वाले खातों के लिए टीईवी अध्ययन और सीडीआर द्वारा तैयार पुनर्रचना पैकेज की विशेषज्ञों की स्वतंत्र मूल्यांकन समिति द्वारा जांच की जाएगी। जैसा कि पैरा 4.3.3 में बताया गया है आईईसी की संरचना और अन्य ब्योरों की जानकारी आईबीए द्वारा बैंकों को अलग से दी जाएगी। यह सुनिश्चित करने के पश्चात् कि पुनर्रचना की शर्तें उधारदाताओं के प्रति उचित हैं, आईईसी अर्थक्षमता के पहलुओं की जांच करेगी। आईईसी से यह अपेक्षित होगा कि वह 30 दिन की अवधि के भीतर जेएलएफ को सूचित करते हुए इन पहलुओं से संबंधित अपनी संस्तुतियां सीडीआर प्रकोष्ठ को दे। तदोपरांत, आईईसी के विचारों को ध्यान में रखते हुए यदि जेएलएफ पुनर्रचना के कार्यक्रम को पूरा करना चाहता है तो उसकी सूचना सीडीआर प्रकोष्ठ को दी जानी चाहिए तथा सीडीआर प्रकोष्ठ को पुनर्रचना पैकेज को आईईसी के विचार प्राप्त होने की तिथि से कुल 7 दिन की अवधि के भीतर सीडीआर ईजी में प्रस्तुत कर देनी चाहिए। तत्पश्चात सीडीआर ईजी को चाहिए कि वह अनुमोदन/संशोधन/निरसन के संबंध में अगले तीस दिनों के भीतर निर्णय लें। यदि सीडीआर ईजी द्वारा अनुमोदित हो जाए तो पुनर्रचना पैकेज सभी ऋणदाताओं द्वारा अनुमोदित होना चाहिए तथा उधारकर्ता को कार्यान्वयन के लिए अगले 30 दिन के भीतर सूचित किया जाना चाहिए। 5. जेएलएफ और सीडीआर प्रकोष्ठ द्वारा पुनर्रचना से संबंधित अन्य मुद्दे/शर्तें 5.1 जेएलएफ तथा सीडीआर दोनों प्रणालियों के अंतर्गत, पुनर्रचना पैकेज में वह समय-सीमा भी निर्धारित होनी चाहिए जिसके अंतर्गत कतिपय अर्थक्षमता मानदंड (उदाहरणार्थ कुछ समय के बाद कतिपय वित्तीय अनुपातों में सुधार, मान लीजिए 6 माह या 1 वर्ष या इसी प्रकार) प्राप्त कर लिए जाएंगे। जेएलएफ को माईलस्टोन प्राप्त करने/न प्राप्त करने के संबंध में खाते की आवधिक समीक्षा करनी चाहिए तथा वसूली उपाय सहित यथोचित उपयुक्त उपायों को शुरू करने पर विचार करना चाहिए। 5.2 पुनर्रचना चाहे जेएलएफ के अंतर्गत हो या सीडीआर के, विनिर्दिष्ट समयावधि में पूरी की जानी है। जेएलएफ और सीडीआर प्रकोष्ठ को विनिर्दिष्ट समयावधि का अधिकतम उपयोग करना चाहिए ताकि किसी भी स्वरूप की पुनर्रचना के अंतर्गत कुल समय सीमा का उल्लंघन न हो। यदि जेएलएफ/सीडीआर किसी कार्य के लिए निर्धारित सीमा से कम समय लेता है, तो उसके पास यह विवेकाधिकार है कि वह बचाए गए समय का अन्य कार्यों के लिए उपयोग करे बशर्ते कुल समय-सीमा का उल्लंघन न हो। 5.3 पुनर्रचना का सामान्य सिद्धान्त यह होना चाहिए कि प्रथम हानि शेयरधारक सहन करें न कि ऋणधारक। इस सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए तथा प्रवर्तकों का और अधिक 'हित शामिल करना' सुनिश्चित करने के लिए किसी ऋण की पुनर्रचना के समय जेएलएफ/सीडीआर निम्नलिखित विकल्पों पर विचार कर सकते हैं:
5.4 यदि किसी उधारकर्ता ने अपने क्रियाकलापों का विस्तार या विविधीकरण किया है जिसके कारण उस समूह के मुख्य कारोबार पर दबाव पड़ा है तो खाते की पुनर्रचना के लिए मुख्य से इतर आस्तियों या अन्य आस्तियों के विक्रय के लिए एक उप-खंड को शर्त के रूप में निर्धारित किया जा सकता है, यदि टीईवी अध्ययन के अंतर्गत मुख्य से इतर कार्यों और अन्य आस्तियों के पृथक्करण के पश्चात खाते के अर्थक्षम होने की संभावना है। 5.5 सूचीबद्ध कंपनियों से संबंधित देयताओं की पुनर्रचना के लिए, ऋणदाताओं को उनकी हानि/त्याग (निवल वर्तमान मूल्य के अनुसार खाते के उचित मूल्य में कमी) के लिए मौजूदा विनियमों और सांविधिक अपेक्षाओं के अधीन कंपनी की इक्विटी पहले ही जारी करके आरंभ से ही भरपाई की जा सकती है। ऐसे मामलों में, पुनर्रचना समझौते में प्रतिपूर्ति के अधिकार की शर्त शामिल नहीं होगी। तथापि यदि इक्विटी जारी करके ऋणदाता के त्याग की पूरी भरपाई नहीं होती है तो प्रतिपूर्ति का अधिकार की शर्त उतनी सीमा तक शामिल की जा सकती है, जितनी कमी है। गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के लिए, जेएलएफ़ के पास यह विकल्प होगा कि वह या तो इक्विटी जारी करवा ले या उपयुक्त 'प्रतिपूर्ति का अधिकार' शर्त समाविष्ट कर ले। 5.6 "पूंजी बाज़ारों में बैंक के एक्सपोजर की सीमाएं" पर 15 दिसंबर 2006 के हमारे परिपत्र बैंपविवि.संख्या.डीआईआर.बीसी.47/13.07.05/2006-07 के पैरा 2.2 में पूंजी बाज़ारों में बैंक के एक्सपोजर की कतिपय सीमाएं निर्धारित की गई है। उक्त परिपत्र के आंशिक संशोधन में यह निर्णय लिया गया है कि यदि उक्त पैरा 5.5 में यथासूचित इक्विटी शेयरों के अर्जन के कारण मौजूदा विनियामक पूंजी बाज़ार एक्सपोजर (सीएमई) सीमा से अधिक एक्सपोजर हो जाता है तो उसे विनियामक सीमा का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। तथापि इसके लिए भारतीय रिज़र्व बैंक को रिपोर्ट किया जाना तथा बैंकों द्वारा उनकी वार्षिक वित्तीय विवरणी में खाते में टिप्पणी में प्रकटन किया जाना आवश्यक होगा। 5.7 प्रतिभूतित ऋणदाताओं, आंशिक रूप से प्रतिभूतित ऋणदाताओं और गैर-प्रतिभूतित ऋणदाताओं के लिए उपलब्ध विभेदक प्रतिभूति ब्याज को स्पष्ट करने के लिए, जेएलएफ़/सीडीआर विविध विकल्पों पर विचार कर सकते हैं जैसे:
उक्त केवल एक सांकेतिक सूची है और जेएलएफ़ एक पारस्परिक रूप से सहमत विकल्प तय कर सकते हैं। इस पर भी बल दिये जाने की आवश्यकता है कि किसी एक उधारकर्ता के मामले में कोई बैंक बेहतर रूप से प्रतिभूतित हो सकता है, किन्तु किसी दूसरे उधारकर्ता के मामले में इसका उल्टा हो सकता है। इसलिए यह लाभप्रद होगा यदि सभी ऋणदाता अन्य ऋणदाताओं की सुविधाओं का ध्यान रखे और, आस्तियों का आर्थिक मूल्य संरक्षित करने के लिए, परस्पर सहमति से विकल्प तय करें। एक बार जब किसी विकल्प पर सहमति हो जाये, तो संरचना पैकेज लागू हो जाने पर सर्वाधिक एक्सपोजर वाला बैंक सहमति की शर्तों के अनुसार वितरण सुनिश्चित करने में अगुआई कर सकता है। 5.8 जहां तक विवेकपूर्ण मानदंडों और परिचालन संबंधी ब्योरों का संबंध है, ओटीएस सहित सीडीआर प्रणाली पर आरबीआई के दिशानिर्देश उसी सीमा तक लागू होंगे, जब तक वे इन दिशानिर्देशों से असंगत न हों। 6. आस्ति वर्गीकरण और प्रावधानीकरण पर विवेकपूर्ण मानदंड 6.1 जब पुनर्रचना प्रस्ताव जेएलएफ़/सीडीआर द्वारा विचाराधीन हो, तो सामान्य आस्ति वर्गीकरण मानदंड का लागू होना जारी रहेगा। किसी आस्ति के पुनः वर्गीकरण की प्रक्रिया केवल इसलिए बाधित नहीं होनी चाहिए कि पुनर्रचना प्रस्ताव जेएलएफ़/सीडीआर द्वारा विचाराधीन है। 6.2 तथापि, किसी पुनर्रचना पैकेज के त्वरित कार्यान्वयन के लिए प्रोत्साहन के रूप में, मौजूदा अनुदेशों के अनुसार खातों की पुनर्रचना पर विशेष आस्ति वर्गीकरण लाभ उन्हीं खातों की पुनर्रचना के लिए उपलब्ध होगा, जिनकी पुनर्रचना इन दिशानिर्देशों के अंतर्गत की गई है बशर्ते उक्त पैरा 4.3 और 4.4 में दिये गए पुनर्रचना पैकेज के ब्योरे में ओवरऑल समयसीमा का पालन हो तथा अनुमोदन की तिथि से 90 दिन के भीतर अनुमोदित पैकेज का कार्यान्वयन हो जाए। जेएलएफ़ के गठन की तिथि के अनुसार आस्ति वर्गीकरण की स्थिति ही वह संबंधित तिथि होगी जिससे अंतिम पुनर्रचना पैकेज के कार्यान्वयन के बाद खाते के आस्ति वर्गीकरण स्थिति तय की जाएगी। जैसा कि 30 मई 2013 के आरबीआई परिपत्र द्वारा बैंकों को सूचित किया गया है, 1 अप्रैल 2015 से सभी पुनर्रचनाओं के लिए उक्त के अनुसार विशेष आस्ति वर्गीकरण लाभ वापस ले लिए जाएँगे। केवल बुनियादी संरचना और गैर-बुनियादी संरचना परियोजना ऋणों की व्यावसायिक परिचालन की तिथि (डीसीसीओ) में परिवर्तनों से संबंधित प्रावधान इसके अपवाद होंगे। 6.3 इन दिशानिर्देशों में दिये गए प्रस्तावों का पालन करने के एक उपाय के रूप में तथा ऋण अनुशासन न बनाए रखने वाले उधारकर्ताओं को हतोत्साहित करने के लिए (पैरा 7 में नीचे दिये गए ब्योरे के अनुसार) त्वरित प्रावधानीकरण मानदंड शुरू किए जा रहे हैं। 7. त्वरित प्रावधानीकरण 7.1 जिन मामलों में बैंक सीआरआईएलसी को खातों की एसएमए स्थिति रिपोर्ट करने में चूक जाते हैं अथवा खातों की वास्तविक स्थिति को छुपाने या उन्हें सदाबहार बनाने के लिए युक्तियों का सहारा लेते हैं, ऐसे खातों के लिए बैंकों पर त्वरित प्रावधानीकरण और/अथवा आरबीआई द्वारा यथोचित समझे जाने वाली अन्य पर्यवेक्षी कार्रवाइयां की जाएंगी। ऐसे अनर्जक खातों के संबंध में वर्तमान प्रावधानीकरण अपेक्षा तथा संशोधित त्वरित प्रावधानीकरण निम्नानुसार हैं:
7.2 इसके अलावा, ऋणदाताओं में से कोई भी जो जेएलएफ़ द्वारा सीएपी के अंतर्गत पुनर्रचना निर्णय के लिए सहमत हुए हैं तथा जो आईसीए और डीसीए में एक हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन बाद में अपना रूख बदल देता है, या पैकेज को लागू करने से इंकार/विलंब करता है, तो इस उधारकर्ता के प्रति उनका एक्सपोजर होने पर, अर्थात यदि यह खाता एनपीए के रूप में वर्गीकृत होता है तो उसे भी त्वरित प्रावधानीकरण अपेक्षा का पालन करना होगा जैसा कि उक्त पैरा 7.1 में बताया गया है। यदि उन ऋणदाताओं की बहियों में खाता मानक है, तो प्रावधानीकरण अपेक्षा 5% होगी। इसके अतिरिक्त, किसी ऋणदाता द्वारा ऐसी कोई वादाखिलाफी पर्यवेक्षी समीक्षा और मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान नकारात्मक पर्यवेक्षी मत को आमंत्रित कर सकता है। 7.3 वर्तमान में, आस्ति वर्गीकरण बैंक विशेष के वसूली के रिकॉर्ड पर आधारित है और प्रावधानीकरण प्रत्येक बैंक के स्तर पर आस्ति वर्गीकरण की स्थिति पर आधारित है। तथापि, यदि ऋणदाता जेएलएफ़ संयोजित करने में असफल रहते हैं या निर्धारित समयसीमा के भीतर एक सामान्य सीएपी पर सहमति बनाने में असमर्थ रहते हैं तो खाते को उक्त पैरा 7.1 में बताए गए अनुसार त्वरित प्रावधानीकरण मानदंड लागू किया जाएगा, यदि उसे एनपीए के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यदि उन ऋणदाताओं बहियों में खाता मानक है, अपेक्षित प्रावधानीकरण 5% होगा। 7.4 यदि जेएलएफ़/सीडीआर प्रणाली के अंतर्गत निलंब मेंटेन करने वाला कोई बैंक उधारकर्ता द्वारा चुकौती के आगमों को निर्धारित शर्तों के अनुसार ऋणदाताओं में वितरित नहीं करता है जिसके कारण अन्य ऋणदाताओं की बहियों में खाते के आस्ति वर्गीकरण में गिरावट होती है, निलंब मेंटेन करने वाले बैंक में जो खाता है उस पर वह आस्ति वर्गीकरण लागू होगा जो ऋणदाता सदस्य बैंकों के बीच न्यूनतम है तथा उस पर संगत प्रावधानीकरण अपेक्षित होगा। 8. इरादतन चूककर्ता और असहयोगी उधारकर्ता 8.1 इरादतन चूककर्ताओं के ट्रीटमेंट से संबंधित अनुदेश "इरादतन चूककर्ता" पर हमारे 01 जुलाई 2013 के मास्टर परिपत्र बैंपविवि.संख्या.सीआईडी.बीसी.3/20.16.003/2013-14 में दिये गए हैं। बैंकों द्वारा इन अनुदेशों का कड़ाई से अनुपालन किया जाना अपेक्षित है। इन अनुदेशों के अतिरिक्त व कंपनियों में बेहतर कारर्पोरेट गवर्नेंस संरचना सुनिश्चित करने के लिए तथा स्वतंत्र/पेशेवर निदेशकों, प्रवर्तकों, लेखापरीक्षकों इत्यादि की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अब से निम्नलिखित विवेकपूर्ण उपाय लागू होंगे: (क) बैंकों के ऐसी कंपनियों में मौजूदा ऋणों/ एक्सपोजर, जिनमें एक या अधिक ऐसे निदेशक हैं (दबाव के समय में बोर्ड पर लाये गए सरकार/वित्तीय संस्थाओं के नामिती निदेशकों को छोड़कर) जिनका नाम इरादतन चूककर्ताओं की सूची में एक से अधिक बार प्रकाशित होता है, के संबंध में प्रावधानीकरण मानक खातों के मामलों में 5% होगा; यदि ऐसा खाता एनपीए के रूप में वर्गीकृत होता है तो इस पर उक्त पैरा 7.1 में बताए अनुसार त्वरित प्रावधानीकरण मानदंड लागू होगा। यह एक विवेकपूर्ण उपाय है क्योंकि ऐसे उधारकर्ताओं के प्रति एक्सपोजर से होने वाली हानियां अधिक होने की संभावना है। यह दुहराया जाता है कि इरादतन चूककर्ता पर 01 जुलाई 2013 के मास्टर परिपत्र के पैरा 2.5 (क) के अनुसार किसी बैंक/वित्तीय संस्था द्वारा सूचीबद्ध चूककर्ताओं को किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधाएं प्रदान नहीं की जाएंगी। (ख) उधारकर्ताओं/चूककर्ताओं को ऋणदाताओं के वास्तविक समाधान/वसूली प्रयासों के प्रति अतार्किक और असहयोगी बनने से हतोत्साहित करने की दृष्टि से बैंक ऐसे उधारकर्ताओं को उचित नोटिस देने और संतोषजनक स्पष्टीकरण प्राप्त न होने के बाद, असहयोगी उधारकर्ताओं4 के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। बैंकों से अपेक्षित होगा कि वे उधारकर्ताओं का ऐसा वर्गीकरण सीआरआईएलसी को रिपोर्ट करें। इसके अलावा बैकों से यह भी अपेक्षित है कि वे ऐसे उधारकर्ताओं के नए ऋणों /एक्सपोजरों के संबंध में उच्चतर/त्वरित प्रावधान करेंगे। वे ऐसे प्रवर्तकों/निदेशकों द्वारा प्रवर्तित किसी अन्य कंपनी के नए ऋणों /एक्सपोजरों के संबंध में अथवा ऐसे किसी कंपनी के नए ऋणों /एक्सपोजरों के संबंध में जिसके बोर्ड में इस असहयोगी उधारकर्ता का कोई प्रवर्तक/निदेशक निदेशक है, में भी उच्चतर/त्वरित प्रावधान करेंगे। ऐसे मामलों में लागू प्रावधानीकरण 5% की दर पर होगा यदि यह मानक खाता है, और उक्त पैरा 7.1 के अनुसार त्वरित प्रावधानीकरण होगा यदि यह एनपीए है। यह एक विवेकपूर्ण उपाय है क्योंकि ऐसे असहयोगी उधारकर्ताओं के प्रति एक्सपोजर से होने वाली हानियों के अधिक होने की संभावना है। 9. सूचना संवितरण 9.1 वर्तमान में, इरादतन चूककर्ताओं के वाद-दाखिल खातों (2.5 मिलियन रूपये और अधिक) की सूची बैंकों द्वारा उन साख सूचना कंपनियों को प्रेषित की जाती है जिनके वे सदस्य होते है। ये कंपनियाँ प्राप्ति के अनुसार इस सूचना को अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित करती हैं। इरादतन चूककर्ताओं के वाद-दाखिल-नहीं खातों (2.5 मिलियन रूपये और अधिक) की सूची गोपनीय होती है और उसका संवितरण आरबीआई द्वारा बैंकों के बीच केवल उन्हीं के प्रयोग के लिए किया जाता है। बैंकों /वित्तीय संस्थाओं द्वारा इरादतन चूककर्ताओं के वाद-दाखिल खातों और वाद-दाखिल-नहीं खातों के नाम रिपोर्ट करने तथा साख सूचना कंपनियों/आरबीआई को बैंकों द्वारा उनकी उपलब्धता को नवीनतम बनाए रखने के लिए बैंकों को सूचित किया जाता है कि वे इरादतन चूककर्ताओं से संबंधित सूचना यथाशीघ्र तथा रिपोर्ट किए जाने की तिथि से अधिकतम एक माह के भीतर प्रेषित करें। बैंक "इरादतन चूककर्ता" पर हमारे 01 जुलाई 2013 के मास्टर परिपत्र बैंपविवि.सं.सीआईडी.बीसी.3/20.16.003/2013-14 में निर्धारित किए गए फ़ारमैट के अनुसार ब्योरेवार सूचना का ही प्रयोग/प्रेषण करें। 9.2 "इरादतन चूककर्ता" पर उक्त मास्टर परिपत्र के अनुसार यदि बैंकों /वित्तीय संस्थाओं द्वारा यह पाया जाये कि उधारकर्ता की ओर से खातों के संबंध में किसी प्रकार का फर्जीवाड़ा किया गया है, और यह पाया जाता है कि लेखापरीक्षकों ने लेखापरीक्षण करने में कोताही बरती थी या कमी रखी थी, तो बैंकों को चाहिए कि वे उधारकर्ता के लेखापरीक्षकों के विरुद्ध भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान (आईसीएसीआई) में औपचारिक शिकायत दर्ज़ करें ताकि आईसीएसीआई लेखापरीक्षकों की जांच कर सके और उनकी जवाबदेही निर्धारित कर सके। आरबीआई इन अनुदेशों को दुहराता है ताकि इनका कड़ाई से पालन हो। जब तक आईसीएसीआई द्वारा कार्रवाई नहीं हो जाती, ये शिकायतें आरबीआई (बैंकिंग परिचालन और विकास विभाग) और भारतीय बैंक संघ (आईबीए) को भी रिकॉर्ड के लिए प्रेषित की जा सकती हैं। जिन बैंकों के विरुद्ध कई सारी शिकायतें प्राप्त हुई, उन लेखाकार संस्थानों का नाम आईबीए सभी बैंकों के बीच परिचालित करेगा ताकि वे उन्हें कोई कार्य देने से पूर्व इस पहलू पर विचार करें। आरबीआई इस प्रकार की सूचना वित्तीय क्षेत्र के अन्य विनियामकों/ कार्पोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए)/ नियंत्रक व महालेखापरीक्षक के साथ भी शेयर करेगा। 9.3 इसके अलावा बैंक ऐसे अधिवक्ताओं से, आस्तियों के संबंध में गलती से स्पष्ट विधिसम्मत स्वामित्व प्रमाणित करते हैं या ऐसे मूल्यांकनकर्ताओं से जो, लापरवाही या संलिप्तता के कारण, प्रतिभूति का मूल्य अतिरंजित करते हैं, स्पष्टीकरण की मांग कर सकते हैं। यदि एक माह के भीतर उनसे उत्तर/ संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं प्राप्त होता है तो वे उनका नाम आईबीए को रिपोर्ट कर सकते हैं। आईबीए ऐसे अधिवक्ताओं/ मूल्यांकनकर्ताओं का नाम अपने सदस्यों के बीच परिचालित कर सकता है ताकि भविष्य में उनकी सेवाएँ लेने से पूर्व वे उन पर विचार कर सकें। आईबीए इस प्रयोजन से एक केंद्रीय पंजीयन कार्यालय बनाएगा। 10. ये दिशानिर्देश 01 अप्रैल 2014 से प्रभावी होंगे भवदीय (राजेश वर्मा) एसएमए-0 दबाव के लक्षण किसी खाते को एसएमए-0 के रूप में वर्गीकृत करने के लिए दबाव के लक्षणों की उदाहरणात्मक सूची
1 'स्पेशल मेंशन एकाउंट' (एसएमए) की शुरुआत 12 सितंबर 2002 के भारतीय रिज़र्व बैंक परिपत्र डीबीएस.सीओ.ओएसएमओएस/बी.सी.4/33.04.006/2002-2003 के अनुसार हुई है जिसके द्वारा बैंकों से अपेक्षित है कि वे एक उप अस्ति श्रेणी, जैसे एसएमए, उत्पन्न कर के खाते में प्रछन्न दबाव की पहचान करें। 2 डीसीए का एक महत्वपूर्ण तत्व होगा 'स्टैंड स्टिल' समझौता जो इन अनुदेशों के पैरा 3.3 और 3.4 में इंगित किए गए समय क्रम के अनुसार डीसीए पर हस्ताक्षर करने की तिथि से पुनर्रचना पैकेज के अनुमोदन की तिथि तक की अवधि तक बाध्यकारी होगा। इस उपखंड के अंतर्गत उधारकर्ता और ऋणदाता दोनों ही एक विधिक रूप से बाध्यकारी 'स्टैंड स्टिल' के लिए सहमत होंगे जिसके द्वारा दोनों ही पक्ष इस प्रकार वचनबद्ध होते हैं कि 'स्टैंड स्टिल' अवधि के दौरान किसी अन्य प्रकार की कानूनी कार्रवाई नहीं करेंगे। किसी न्यायिक या अन्य प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप के बिना आवश्यक ऋण पुनर्रचना प्रक्रिया शुरू करने के लिए यह जरूरी है। तथापि 'स्टैंड स्टिल' उपखंड केवल उधारकर्ता या ऋणदाता द्वारा दूसरे पक्ष के प्रति किसी सिविल कार्रवाई पर लागू होगा और इसमें आपराधिक कारवाई शामिल नहीं है। इसके अलावा 'स्टैंड स्टिल' अवधि के दौरान बकाया विदेशी मुद्रा वायदा करार, डेरिवेटिव उत्पाद इत्यादि को क्रिस्टलीकृत किया जा सकता है, बशर्ते उधारकर्ता इस प्रकार के क्रिस्टलीकारण के लिए सहमत हो। उधारकर्ता इसके अतिरिक्त यह भी वचन देगा कि स्टैंड स्टिल अवधि के दौरान लिमिटेशन के प्रयोजन से दस्तावेज़ों की अवधि बढ़ जाएगी और यह भी कि वह किसी प्रकार की राहत के लिए किसी अन्य प्राधिकारी से संपर्क नहीं करेगा और उधारकर्ता कंपनी के निदेशक 'स्टैंड स्टिल' अवधि के दौरान निदेशक मण्डल से इस्तीफा नहीं देंगे। 3 आईईसी का संगठन और स्वतंत्र विशेषज्ञों के शुल्क के भुगतान के लिए फंडिंग संबंधी आवश्यकताएं बहरतीय बैंक संघ द्वारा आरबीआई से परामर्श करके तय की जाएंगी। 4 असहयोगी उधारकर्ता मोटे तौर पर वह उधारकर्ता है जो किसी ऋणदाता को उसके वित्तीय स्वस्थ्य का मूल्यांकन करने के लिए आवश्यक सूचना दो अनुस्मारक मिलने के बाद भी प्रस्तुत नहीं करता है; या जो ऋण मंजूरी की शर्तों के अनुसार प्रतिभूतियों इत्यादि तक पहुँचने नहीं देता है अथवा निर्धारित अवधि के भीतर ऋण करार की अन्य शर्तों का पालन नहीं करता है; अथवा जो बैंक से चुकौती के मुद्दों पर बातचीत करने के संबंध में प्रतिरोधी /उदासीन/नकारात्मक मुद्रा में है; या जो यह भाव व्यक्त करते हुए समय से निकालता है कि कोई समाधान मिलने ही वाला है; अथवा जो खीझ उत्पन्न करने वाली हरकतें करता है जैसे कि उधारकर्ता/ओं के हितों के सामयिक समाधान पर मुकदमेबाज़ी के द्वारा पानी फेरना। उधारकर्ताओं के नाम असहयोगी उधारकर्ता के रूप में रिपोर्ट किए जाने से पूर्व उन्हें अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए 30 दिन का समय दिया जाएगा। |
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