अर्थव्यवस्था में दबावग्रस्त आस्तियों को सशक्त करने के लिए ढांचा – परियोजना ऋणों को पुनर्वित्त प्रदान करना, एनपीए का विक्रय तथा अन्य विनियामक उपाय
|
आरबीआई/2013-14/502 26 फरवरी 2014 सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर) महोदय, अर्थव्यवस्था में दबावग्रस्त आस्तियों को सशक्त करने के लिए ढांचा – परियोजना ऋणों को पुनर्वित्त प्रदान करना, एनपीए का विक्रय तथा अन्य विनियामक उपाय कृपया अर्थव्यवस्था में दबावग्रस्त आस्तियों को पुनर्जीवित करने के लिए ढांचा के पैरा 5 और 8 देखें जिसे 30 जनवरी 2014 को हमारी वेबसाइट पर डाला गया था। तदनुसार, 'परियोजना ऋणों के पुनर्वित्तीयन', 'बैंकों द्वारा एनपीए का विक्रय' विषय पर व्यापक दिशानिर्देश तथा अन्य विनियामक उपाय निम्नवत हैं:2. परियोजना ऋणों का पुनर्वित्तीयन 2.1 'बैंकों द्वारा अग्रिमों की पुनर्रचना से संबंधित विवेकपूर्ण दिशानिर्देश' पर 27 अगस्त 2008 के हमारे परिपत्र बैंपविवि. सं. बीपी. बीसी. 37 /21.04.132/2008-09 के अनुसार, पुनर्रचित खाता ऐसा खाता है जहां बैंक उधारकर्ता की वित्तीय कठिनाई से संबंधित आर्थिक अथवा विधिक कारणों के लिए उधारकर्ता को ऐसी रियायतें प्रदान करता है जिन्हें प्रदान करने पर वह अन्यथा विचार न करता। पुनर्रचना में सामान्यतः अग्रिमों /जमानत की शर्तों में संशोधन किया जाएगा जिसमें सामान्यतः अन्य बातों के साथ चुकौती की अवधि /चुकौती योग्य राशि /किस्तों की राशि /ब्याज की दर (प्रतियोगी कारणों को छोड़कर अन्य कारणों से) में परिवर्तन शामिल होगा। इस प्रकार किसी ऋण के चुकौती कार्यक्रम में किसी प्रकार का परिवर्तन होने से वह ऋण पुनर्रचित माना जाएगा।2.2 साथ ही, 'आय निर्धारण, आस्ति वर्गीकरण, प्रावधानीकरण तथा अन्य संबंधित मामले और पूंजी पर्याप्तता मानक – अंतरण वित्त (टेक आउट फ़िनान्स)' के संबंध में 29 फरवरी 2000 के परिपत्र बैंपविवि. बीपी. बीसी. 144 /21.04.048-2000 के अनुसार बैंक किसी अन्य वित्तीय संस्था के साथ पूर्व निर्धारित आधार पर अंतरण वित्त व्यवस्था करके अपने मौजूदा बुनियादी संरचना परियोजना ऋणों को पुनर्वित्त प्रदान कर सकते हैं। यदि कोई पूर्व निर्धारित व्यवस्था न हो तो भी 'उधार खातों का एक बैंक से दूसरे बैंक में अंतरण' पर दिनांक 10 मई 2012 के हमारे परिपत्र बैपविवि.बीपी .बीसी . 104/ 21.04.048 /2011-12 द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अधीन बैंक की बही में किसी मानक खाते को किसी अन्य बैंक/ वित्तीय संस्था द्वारा अधिगृहीत किया जा सकेगा। 2.3 उक्त परिपत्रों में आंशिक संशोधन करते हुए, बैंकों को सूचित किया जाता है कि यदि वे, अन्य बैंकों/वित्तीय संस्थानों के साथ पूर्व-निर्धारित व्यवस्था के बिना ही, किसी मौजूदा बुनियादी संरचना या किसी अन्य परियोजना ऋण को अंतरण वित्तपोषण के जरिए पुनर्वित्त प्रदान करते हैं तथा दीर्घतर चुकौती अवधि निर्धारित करते हैं तो उसे पुनर्रचना नहीं माना जाएगा बशर्ते :
3. प्रतिभूतीकरण कंपनी (एससी)/पुनर्रचना कंपनी (आरसी) को वित्तीय आस्तियों का विक्रय 3.1 प्रतिभूतीकरण कंपनियों (एससी)/पुनर्रचना कंपनियों को दबावग्रस्त आस्ति प्रबंधन के लिए समर्थन प्रणाली के रूप में माना जाना चाहिए जिसमें आस्ति विक्रय के बजाय आस्ति पुनर्निर्माण पर अधिक जोर होना चाहिए। इसके लिए, एससी/आरसी को आस्ति विक्रय किए जाने को प्रोत्साहन उस स्तर पर दिया जाना चाहिए जब आस्तियों के पास पुनर्जीवन की अच्छी संभावना हो तथा वसूली के मूल्य की रकम अच्छी हो। 'प्रतिभूतीकरण कंपनी (एस सी)/पुनर्निर्माण कंपनी (आर सी) (वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्रचना एवं प्रतिभूति हित प्रवर्तन अधिनियम, 2002 के अंतर्गत निर्मित) को वित्तीय आस्तियों की बिक्री और संबंधित मुद्दे पर दिशानिर्देश' पर 23 अप्रैल 2003 के परिपत्र बैंपविवि.सं.बीपी.बीसी.96/21.04.048/2002-03 के अनुसार किसी बैंक /वित्तीय संस्था द्वारा प्रतिभूतीकरण कंपनी /पुनर्निर्माण कंपनी को वित्तीय आस्ति उस स्थिति में बेची जा सकती है जहां वह आस्ति 3.2 उपर्युक्त के अलावा तथा दबावग्रस्त आस्तियों के पुनर्निर्माण की बेहतर संभावनाओं को सुनिश्चित करने के लिए, भविष्य में किसी बैंक/वित्तीय संस्था द्वारा एससी/आरसी को कोई वित्तीय आस्ति तब बेची जा सकती है जब आस्ति को बैंक/एफआई द्वारा SMA-21 के रूप में रिपोर्ट करते हुए सेंट्रल रिपोजिटरी फॉर इन्फॉर्मेशन ऑन लार्ज क्रेडिट (CRILC)2 को एक वित्तीय आस्ति के रूप में रिपोर्ट किया गया हो। 3.3 साथ ही, 23 अप्रैल 2003 के उक्त परिपत्र का पैरा 5(ए) अन्य बातों के साथ-साथ यह भी सूचित करता है कि: 3.4 बैंकों को अपने एनपीए का उचित मूल्य तुरंत प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अब से बैंक एनपीए के विक्रय पर अतिरिक्त प्रावधान को तब प्रति-प्रविष्ट कर सकते हैं जब विक्रय, रकम प्राप्त होने वाले वर्ष में उसके लाभ तथा हानि खाते में एनबीवी मूल्य की तुलना में, अधिक मूल्य के लिए होता है। साथ ही, यदि दो वर्ष की अवधि के दौरान विक्रय मूल्य एनबीवी से कम है तो, एनपीए को शीघ्र विक्रय करने के प्रोत्साहन के रूप में, बैंक किसी भी कमी को पूरा (स्प्रेड ओवर) कर सकते हैं। तथापि, कमी को पूरा करने की यह सुविधा केवल 31 मार्च 2015 तक विक्रय कर दिये गए एनपीए के लिए उपलब्ध रहेगी तथा यह बैंकों के वार्षिक वित्त विवरणों में लेखे पर टिप्पणियों में आवश्यक प्रकटीकरणों के अधीन होगी। 3.5 हमारे ध्यान में यह लाया गया है कि बैंक कभी-कभी एनपीए आस्तियों के विक्रय के लिए नीलामी प्रक्रिया का प्रयोग ऐसी आस्तियों के लिए मूल्य खोज प्रणाली के रूप में करते हैं; जहां वे एससी/आरसी कंपनियों से निविदाएं मांगते हैं तथा बिना कोई कारण दिए किसी भी निविदा को स्वीकार नहीं करते हैं। चूंकि निविदाओं को आमंत्रित करने हेतु एससी/आरसी के लिए महंगी तथा दीर्घकालिक उचित सावधानी की प्रक्रिया अपनाना आवश्यक होता है, बैंकों द्वारा इस प्रकार की प्रथाएं बाजार में अशुद्धियां ले आती हैं क्योंकि इनसे एससी/आरसी कंपनियों उचित सावधानी बरतने से हतोत्साहित होती हैं। अतएव यह सूचित किया जाता है कि एससी/आरसी को एनपीए बेचने के लिए नीलामी प्रक्रिया का प्रयोग करने वाले बैंकों को और भी पारदर्शी होना चाहिए तथा रिज़र्व मूल्य को प्रकट करना चाहिए व निविदाओं को अस्वीकार करने का कारण इत्यादि बताना चाहिए। यदि प्राप्त की गई कोई निविदा आरक्षित मूल्य से अधिक है तथा विक्रय से प्राप्त राशि का न्यूनतम 50 प्रतिशत नकदी के रूप में है और निविदा प्रस्ताव दस्तावेज में विनिर्दिष्ट अन्य शर्तों को भी पूरा करता है तो उस निविदा को स्वीकार किया जाना अनिवार्य होगा। 4. अन्य बैंकों को अनर्जक आस्तियों का क्रय/विक्रय 4.1 'अनर्जक आस्तियों के क्रय/विक्रय पर दिशानिर्देश' पर दिनांक 13 जुलाई 2005 के हमारे परिपत्र बैंपविवि.सं. बीपी. बीसी.16/21.04.048/2005-06 में, जिसे 'आय की पहचान, आस्ति वर्गीकरण तथा अग्रिमों से संबंधित प्रावधानीकरण' पर हमारे मास्टर परिपत्र में समेकित तथा अद्यतन किया गया है, अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित निर्धारण किया गया है: किसी बैंक की बहियों में कोई अनर्जक आस्ति दूसरे बैंकों को विक्रय करने हेतु तभी पात्र होगी जब वह विक्रेता बैंक की बहियों में कम से कम 2 वर्षों तक अनर्जक आस्ति रही हो। क्रेता बैंक द्वारा किसी अनर्जक आस्ति को किसी अन्य बैंक को विक्रय करने से पूर्व कम से कम 15 माह के लिए अपनी बहियों में धारण करना होगा। 4.2 उक्त दिशानिर्देशों में आंशिक संशोधन के साथ यह सूचित किया जाता है कि बैंकों को अपना एनपीए किसी आरंभिक धारिता अवधि के बिना अन्य बैंकों/वित्तीय संस्थाओं/एनबीएफसी को (एससी/आरसी कंपनियों को छोड़कर) विक्रय करने की अनुमति होगी। तथापि क्रेता द्वारा उस एनपीए को किसी अन्य बैंकों/वित्तीय संस्थाओं/एनबीएफसी अनर्जक आस्ति (एससी/आरसी कंपनियों को छोड़कर) को बेचने से पूर्व कम से कम 12 माह की अवधि के लिए धारित किया जाना चाहिए। क्रेता बैंकों/ वित्तीय संस्थाओं/एनबीएफसी की बहियों में ऐसी आस्तियों के आस्ति वर्गीकरण से संबंधित मौजूदा विवेकपूर्ण मानदंड अपरिवर्तित रहेंगे। 5. प्रति-चक्रीय/अस्थायी प्रावधान का उपयोग 5.1 'अस्थायी प्रावधानों की उत्पत्ति और उनके उपयोग पर विवेकपूर्ण मानदंड' पर हमारे दिनांक 22 जून 2006 के परिपत्र बैंपविवि. बीपी. बीसी. 89/21.04.048/2005-06 तथा 13 मार्च 2007 के परिपत्र बैंपविवि. बीपी. बीसी. 68/21.04.048/2006-07 के अनुसार अस्थायी प्रावधानों का उपयोग अनर्जक आस्तियों के संबंध में विनिर्दिष्ट प्रावधान करने या मानक आस्तियों के लिए विनियामक प्रावधान करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उनका प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में भारतीय रिज़र्व बैंक की पूर्वानुमति तथा बोर्ड का अनुमोदन प्राप्त करने के बाद आकस्मिकताओं के लिए क्षतिग्रस्त खातों में विनिर्दिष्ट प्रावधान करने के लिए किया जा सकेगा। 5.2 इसी क्रम में, 'अग्रिमों के लिए प्रावधानीकरण कवरेज अनुपात (पीसीआर)' पर 21 अप्रैल 2011 के परिपत्र बैंपविवि. बीपी. बीसी. 87/21.04.048/2010-11 के अनुसार बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक की पूर्वानुमति से, अन्य बातों के साथ-साथ, सम्पूर्ण प्रणाली में व्याप्त मंदी के दौरान अनर्जक आस्तियों के लिए विनिर्दिष्ट प्रावधान करने हेतु प्रतिचक्रीय प्रावधानीकरण बफर का उपयोग करने की अनुमति दी जाएगी। तदनुसार भारतीय रिज़र्व बैंक ने 'अस्थायी प्रावधान/प्रतिचक्रीय प्रावधान बफर के उपयोग' पर 7 फरवरी 2014 के परिपत्र बैंपविवि. बीपी. 95/21.04.048/2013-14 द्वारा, एक प्रतिचक्रीय उपाय के रूप में, बैंकों को उनके द्वारा 31 मार्च 2013 की स्थिति के अनुसार धारित प्रतिचक्रीय प्रावधानीकरण बफर/ अस्थायी प्रावधानों का 33% तक उपयोग करने की अनुमति निदेशक मंडल द्वारा अनुमोदित नीति के अनुसार अनर्जक आस्तियों के लिए विनिर्दिष्ट प्रावधान करने के लिए दी है। 5.3 बैंकों द्वारा 31 मार्च 2013 को धारित ऐसे प्रावधानों के 33 प्रतिशत तक के प्रतिचक्रीय/अस्थायी प्रावधान के उपर्युक्त उपयोग के अतिरिक्त यह निर्णय लिया गया है कि बैंक अनर्जक आस्तियों का विक्रय होने पर किसी कमी को पूरा करने के लिए- अर्थात् जब विक्रय निवल बही मूल्य (एनबीवी) [अर्थात् मूल्य में से धारित प्रावधान को घटाकर] से कम हो तथा उसके कारण वर्तमान में लाभ और हानि खाते में से डेबिट करना अपेक्षित हो जाए- प्रतिचक्रीय/ अस्थायी प्रावधान का उपयोग कर सकते हैं। 6. प्रवर्तकों के योगदान के वित्तपोषण के लिए बैंक ऋण 6.1 'ऋण तथा अग्रिम – सांविधिक तथा अन्य प्रतिबंध' के संबंध में 01 जुलाई 2013 के हमारे मास्टर परिपत्र बैंपविवि. सं. डीआईआर. बीसी. 14/13.03.00/2013-14 में किए गए समेकन के अनुसार प्रवर्तकों के अंशदान के वित्तपोषण के लिए बैंक ऋण पर मौजूदा अनुदेशों के अनुसार किसी कंपनी की इक्विटी पूंजी में प्रवर्तकों का अंशदान उनके स्वयं के स्रोतों से होना चाहिए तथा बैंकों को सामान्यतः अन्य कंपनियों के शेयर अधिग्रहीत करने के लिए अग्रिम नहीं प्रदान करना चाहिए। 6.2 यह निर्णय लिया गया है कि उक्त मास्टर परिपत्र में दिए गए अनुसार शेयरों/डिबेंचरों/बांडों की जमानत पर दिए जाने वाले अग्रिमों के लिए लागू सामान्य दिशानिर्देशों तथा अन्य विनियामक एवं सांविधिक एक्सपोजर सीमाओं के अधीन बैंक संकटग्रस्त कंपनियों को अधिगृहीत करने के लिए स्थापित 'विशेषीकृत' संस्थाओं को वित्त प्रदान कर सकते हैं। अतः उधारकर्ताओं को ऐसे वित्तपोषण से संबद्ध जोखिमों का मूल्यांकन करना चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन संस्थाओं को पर्याप्त रूप से पूंजी संपन्न किया गया है तथा इन संस्थाओं के लिए ऋण इक्विटी अनुपात 3:1 से अधिक नहीं है। 6.3 इस संबंध में 'विशेषीकृत' संस्था वह कारपोरेट निकाय होगा जिसे विशिष्ट रूप से संकटग्रस्त कंपनियों का अधिग्रहण करने तथा उनका रूपांतरण करने के लिए स्थापित किया गया हो तथा ऐसी कंपनी का प्रवर्तन वे व्यक्ति अथवा/और संस्थागत प्रवर्तक (जिसमें सरकार भी शामिल है) करते होंगे जिन्हें 'संकटग्रस्त' कंपनियों के रूपांतरण में व्यावसायिक विशेषज्ञता हासिल होगी तथा जो उस उद्योग/सेगमेंट में निवेश के लिए पात्र होंगे जिससे विचाराधीन आस्ति संबंधित है। 7. ऋण जोखिम प्रबंधन 7.1 बैंकों को सूचित किया जाता है कि उन्हें 'बैंकों में जोखिम प्रबंध प्रणाली' पर 07 अक्तूबर 1999 के हमारे परिपत्र बैंपविवि. सं. बीपी. (एससी). बीसी. 98/21.04.103/99 तथा 'ऋण जोखिम तथा बाजार जोखिम के प्रबंध पर मार्गदर्शी टिप्पणियां' पर 12 अक्तूबर 2002 के हमारे परिपत्र बैंपविवि. सं. बीपी. 520/21.04.103/2002-03 में दिए गए ऋण जोखिम प्रबंध दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। 7.2 यह दोहराया जाता है कि ऋणदाताओं को सभी मामलों में अपना आत्मनिर्भर और वस्तुनिष्ठ ऋण मूल्यांकन करवाना चाहिए तथा उन्हें बाहरी परामर्शदाताओं, विशेषतः ऋण प्राप्तकर्ता के आंतरिक परामर्शदाताओं के द्वारा तैयार किए गए ऋण मूल्यांकन रिपोर्टों पर, निर्भर नहीं रहना चाहिए। 7.3 बैंकों/ऋणदाताओं को संवेदनशीलता परीक्षण/परिदृश्य विश्लेषण करवा लेना चाहिए, विशैष तौर पर बुनियादी संरचना परियोजनाओं के लिए जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ परियोजना विलंब तथा लागत में वृद्धि का अध्ययन भी शामिल होना चाहिए। 'अर्थ व्यवस्था में दबावग्रस्त आस्तियों को पुनर्जीवित करने के लिए ढांचा – संयुक्त ऋणदाता फोरम (जेएलएफ) और सुधारात्मक कार्रवाई योजना (सीएपी) पर दिशानिर्देश' पर 26 फरवरी 2014 के हमारे परिपत्र बैंपविवि. बीपी.बीसी. सं. 97/21.04.132/2013-14 के पैरा 3 में दिए गए अनुसार सुधारात्मक कार्रवाई योजना (सीएपी) निर्धारित करते समय परियोजना की अर्थक्षमता के संबंध में दृष्टिकोण बनाने में इससे मदद मिलेगी। 7.4 ऋणदाताओं को प्रवर्तकों/शेयरधारकों द्वारा लायी गई पूंजी के स्रोत एवं गुणवत्ता को सुनिश्चित कर लेना चाहिए। बहुविध (मल्टिपल) लेवरेजिंग, विशेष रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में, चिंता का विषय है क्योंकि यह ऋण/इक्विटी अनुपात जैसे वित्तीय अनुपातों को प्रभावपूर्ण तरीके से छद्मता प्रदान करती है जिसकी परिणति उधारकर्ताओं के गलत चयन में होती है। अतएव ऋण मूल्यांकन के समय ऋणदाताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मूल कंपनी का कर्ज सहायक/एसपीवी कंपनी की इक्विटी पूंजी के रूप में परिणत नहीं हुआ है। 7.5 कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय ने निदेशक पहचान संख्या (डीआईएन) की अवधारणा शुरू की है जिसके लिए कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2006 में धारा 266ए से 266जी को समाविष्ट किया गया है। साथ ही, इरादतन चूककर्ताओं पर 01 जुलाई 2013 के हमारे मास्टर परिपत्र के पैरा 5.4 के अनुसार यह सुनिश्चित करने के लिए कि निदेशकों की सही पहचान की गई है तथा किसी एक भी मामले में ऐसे व्यक्तियों को गलत तरीके से ऋण सुविधाओं से वंचित न किया जाए जिनका नाम उन निदेशकों के नाम से मिलता-जुलता प्रतीत होता है जो इरादतन चूककर्ता की सूची में हैं, बैंकों/वित्तीय संस्थाओं को सूचित किया गया है कि वे भारतीय रिज़र्व बैंक/साख सूचना कंपनियों को प्रस्तुत किए जाने वाले आंकड़ों में निदेशक पहचान सं. (डीआईएन) को भी एक फील्ड के रूप में सम्मिलत करें। 7.6 यह दोहराया जाता है कि ऋण मूल्यांकन करते समय, बैंकों को यह जांच करनी चाहिए कि कहीं डीआईएन/पीएएन इत्यादि के संदर्भ द्वारा चूककर्ताओं/इरादतन चूककर्ताओं की सूची में किसी भी कंपनी के निदेशकों का नाम तो प्रकट नहीं हो रहा है। साथ ही, समान नाम के कारण किसी प्रकार का संदेह उत्पन्न होने पर बैंकों को निदेशकों की पहचान की पुष्टि करने के लिए स्वतंत्र स्रोतों का प्रयोग करना चाहिए न कि उधारकर्ता कंपनी से घोषणा की मांग करनी चाहिए। 7.7 इरादतन चूककर्ताओं पर हमारे मास्टर परिपत्र का पैरा 2.7 सूचित करता है कि "निधियों के वास्तविक प्रयोग (एंड यूज) की निगरानी के लिए, यदि ऋणदाता उधारकर्ता के लेखा-परीक्षकों से निधियों के डाइवर्जन/दुरुपयोग के संबंध में कोई विनिर्दिष्ट प्रमाणीकरण चाहते हैं तो ऋणदाता को इस उद्देश्य के लिए लेखा परीक्षकों को पृथक अधिदेश देना चाहिए। लेखा-परीक्षकों द्वारा इस प्रकार के प्रमाणीकरण को सुविधाजनक बनाने के लिए बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ऋण करार में समुचित प्रसंविदाएं शामिल कर ली जाएं ताकि ऋणदाता द्वारा उधारकर्ताओं/लेखा-परीक्षकों को ऐसा अधिदेश प्रदान किया जा सके।" 7.8 उक्त के अतिरिक्त, बैंकों को सूचित किया जाता है कि निधियों के वास्तविक प्रयोग (एंड यूज) की निगरानी सुनिश्चित करने तथा उधारकर्ताओं द्वारा निधियों का दुरुपयोग रोकने के लिए ऋणदाता, उधारकर्ता के लेखापरीक्षकों द्वारा दिए गए प्रमाणीकरण पर विश्वास किए बिना, ऐसे विनिर्दिष्ट प्रमाणीकरण प्रयोजन के लिए अपने स्वयं के लेखापरीक्षकों को नियुक्त करने पर विचार कर सकते हैं। तथापि, इससे बैंक द्वारा बुनियादी न्यूनतम सावधानी की आवश्यकता समाप्त नहीं होती। 8. विनियामक अनुदेशों को सुदृढ़ करना 8.1 'नकद क्रेडिट प्रणाली की समीक्षा हेतु कार्यदल की रिपोर्टें –कार्यान्वयन' पर 8 दिसंबर 1980 के परिपत्र बैंपविवि. सं. सीएएस (सीओडी) बीसी. 142/डब्ल्यूजीसीसी-80 के अनुसार बैंकों को सूचित किया गया था कि चालू खाता खोलने/विक्रयोत्तर सीमा मंजूर करने से पहले उन्हें मुख्य बैंकरों तथा/अथवा इनवेंटरी सीमाओं को मंजूर करने वाले बैंकों की सहमति प्राप्त कर लेनी चाहिए। इन अनुदेशों के आलोक में पहले से ही खोले गए इस प्रकार के खातों की समीक्षा की जानी चाहिए तथा उचित कार्रवाई की की जानी चाहिए। साथ ही, 'गारंटी तथा सह-स्वीकृतियों पर 01 जुलाई 2013 के मास्टर परिपत्र बैंपविवि. सं. डीआईआर. बीसी.12/13.03.00/2013-14 के अनुसार बैंकों को ऐसे ग्राहकों की ओर से गारंटी जारी करने से बचना चाहिए जिहोने उनसे ऋण नहीं लिया है। 8.2 भारतीय रिज़र्व बैंक ऐसे ग्राहकों, जो नियमित उधारकर्ता नहीं हैं को गैर-निधि आधारित सीमाओं सहित ऋण सुविधाएं प्रदान करने, चालू खाता खोलने इत्यादि के संबंध में बैंकों पर लगाए गए प्रतिबंधों के संबंध में उक्त अनुदेशों को दोहराता है। यदि उक्त अनुदेशों का सख्ती से पालन नहीं हुआ हो तो बैंकों को आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई करनी चाहिए। इसी क्रम में भारतीय रिज़र्व बैंक इन अनुदेशों का बैंकों द्वारा सख्ती से पालन करना सुनिश्चित करेगा। चूंकि इस संबंध में भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुदेशों के गैर-अनुपालन से ऋण अनुशासन कुप्रवृत्त हो सकता है, भारतीय रिज़र्व बैंक अनुपालन न करने वाले बैंकों को दंडित करने पर विचार करेगा। 8.3 बैंक जनता की जमाराशियों के अभिरक्षक हैं, अतएव उनसे अपेक्षित है कि वे अपनी आस्तियों के मूल्य की रक्षा करने के लिए सभी प्रयास करेंगे। बैंकों से अपेक्षित है कि किसी खाते को पूर्ण या आंशिक रूप से अपलिखित (राइट ऑफ) करने से पूर्व वसूली के सभी उपायों का प्रयोग करें। यह पाया गया है कि कुछ बैंक खातों के तकनीकी अपलेखन (टेक्निकल राइट ऑफ) का सहारा ले रहे हैं जिससे वसूली से हो सकने वाले लाभ कम हो जाते हैं। आंशिक या तकनीकी अपलेखनों का सहारा लेने वाले बैंकों को ऋण के बकाया हिस्से को मानक आस्ति के रूप में नहीं दर्शाना चाहिए। अधिक पारदर्शिता लाने की दृष्टि से, भविष्य में बैंकों को अनुबंध में निर्धारित फार्मेट के अनुसार तकनीकी अवलेखनों के लिए पृथक ब्योरे समेत अवलेखनों का पूर्ण ब्योरा प्रकट करना चाहिए। 9. सीईआरएसएआई के साथ लेनदेनों का रजिस्ट्रेशन वर्तमान में प्रतिभूति पंजीकरण, विशेष तौर पर बंधकों का रजिस्ट्रेशन, जिला स्तर पर किया जाता है तथा केंद्रीय प्रतिभूतीकरण आस्ति पुनर्रचना और भारतीय प्रतिभूति हित (सीईआरएसएआई) की रजिस्ट्री को आमतौर पर इक्विटेबल मार्गेज को रजिस्टर करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। सीईआरएसएआई के साथ सभी प्रकार के मार्गेज की रजिस्ट्री करने के सरकारी अधिदेशों का बैंकों द्वारा कड़ाई से पालन किया जाना होगा। इस संबंध में 'वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतीकरण और पुनर्रचना एवं प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम 2002 के अंतर्गत केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक रजिस्टर स्थापित करने के संबंध में 21 अप्रैल 2011 के हमारे मास्टर परिपत्र बैंपविवि. एलईजी. सं. बीसी. 86/09.08.011/2010-11 में दिए गए अनुदेशों को दुहराया जाता है अर्थात् वित्तीय आस्तियों के प्रतिभूतीकरण और पुनर्रचना से संबंधित लेनदेनों तथा बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं द्वारा प्रदान किए जाने वाले किसी ऋण या अग्रिम को प्रतिभूतित करने के लिए स्वत्व विलेख जमा करके किए जाने वाले मार्गेज से संबंधित लेनदेनों को, सरफेसी अधिनियम में दी गई परिभाषा के अनुसार, केंद्रीय रजिस्ट्री में रजिस्टर किया जाना है। 10. बोर्ड द्वारा निगरानी 10.1 बैंकों के निदेशक मंडल को अपनी बहियों में आस्ति गुणपवत्ता की क्षरणशीलता को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना चाहिए तथा ऋण जोखिम प्रबंध प्रणाली को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। आस्ति गुणवत्ता में समस्याओं की शीघ्र पहचान और इन दिशानिर्देशों में अभिव्यक्त संकल्पों में यह अपेक्षित है कि ऋणदाता अत्यधिक सक्रिय रहें तथा जैसे ही सीआरआईएलसी कार्य करना शुरू करे, उसका उपयोग करें। 10.2 बैंकों के निदेशक मंडल को समय रहते सीआरआईएलसी में साख सूचना प्रेषित करने और उससे सूचना प्राप्त करने के लिए, संयुक्त ऋणदाता फोरम (जेएलएफ)3 का त्वरित निर्माण करने के लिए, जेएलएफ की प्रगति की निगरानी करने के लिए तथा सुधारात्मक कार्य योजना (सीएपी)4 इत्यादि को अपनाने के लिए एक नीति स्थापित करनी चाहिए। उक्त नीति की आवधिक, जैसे कि छमाही आधार पर, समीक्षा होनी चाहिए। 10.3 उधारकर्ताओं का इरादतन चूककर्ताओं अथवा/और असहयोगी उधारकर्ताओं5 के रूप में सम्यक रूप से और समय से वर्गीकरण करने के लिए बैंकों के निदेशक मंडल को एक प्रणाली स्थापित करनी चाहिए। साथ ही, बैंकों को इस प्रकार वर्गीकृत खातों की आवधिक, जैसे कि छमाही आधार पर, समीक्षा करनी चाहिए । भवदीय, (राजेश वर्मा) राइट-ऑफ तथा तकनीकी राइट-ऑफ का प्रकटीकरण 'खाते पर टिप्पणी में बैंकों द्वारा अतिरिक्त प्रकटीकरण' पर 15 मार्च 2010 के हमारे परिपत्र बैंपविवि. बीपी. बीसी. सं. 79/21.04.018/2009-10 में दिए गए अनुदेशों में बैंकों से विनिर्दिष्ट रूप से अपेक्षित है कि वे अनर्जक आस्तियों की स्थिति में परिवर्तन के ब्योरे देते समय वर्ष के दौरान बट्टा खाता डाली गई रकम को प्रकट करें। उक्त परिपत्र में निर्धारित फार्मेट में निम्नलिखित प्रकार से संशोधित किया गया है: (राशि करोड़ रुपये में)
इसके साथ-साथ बैंकों को तकनीकी राइट-ऑफ के स्टॉक तथा उन से की गई वसूलियों को निम्नलिखित फार्मेट के अनुसार प्रकट करना चाहिए:
1 SMA 2 – Special Mentioned Account 2 as defined in our circular DBOD.BP.BC.No.97/21.04.132/2013-14 dated February 26, 2014 on ‘Framework for Revitalising Distressed Assets in the Economy – Guidelines on Joint Lenders’ Forum (JLF) and Corrective Action Plan (CAP)’ 2 CRILC as mentioned in DBS’ circular DBS.No.OSMOS. 9862/33.01.018/2013-14 dated February 13, 2014 on ‘Central Repository of Information on Large Credits (CRILC) – Revision in Reporting’ 3, 4 and 5 JLF, CAP & Non-Cooperative Borrowers - as detailed in our circular DBOD.BP.BC.No.97/21.04.132/2013-14 dated February 26, 2014 on ‘Framework for Revitalising Distressed Assets in the Economy – Guidelines on Joint Lenders’ Forum (JLF) and Corrective Action Plan (CAP). 6 *Gross NPAs as per item 2 of Annex to DBOD Circular DBOD.BP.BC.No. 46/21.04.048/2009-10 dated September 24, 2009 which specified a uniform method to compute Gross Advances, Net Advances, Gross NPAs and Net NPAs. 7 Technical or prudential write-off is the amount of non-performing loans which are outstanding in the books of the branches, but have been written-off (fully or partially) at Head Office level. Amount of Technical write-off should be certified by statutory auditors. (Defined in our circular reference DBOD.No.BP.BC. 64 /21.04.048/2009-10 dated December 1, 2009 on Provisioning Coverage for Advances) |
पृष्ठ अंतिम बार अपडेट किया गया: